Skip to main content

Posts

Showing posts from 2015

बुनी हुई क्लास

छात्र जीवन में या यूँ कहें की स्कूली जीवन में सबसे अधिक आनंद तब आता था जब स्कूल बंद हो , मास्टर साहब न आएं हो , स्कूल बस छूट गयी हो , या  फिर किसी आकस्मिक घटना की वजह से छुट्टी हो गयी हो यानी की वजह कोई भी हो बस पढाई से मुक्ति मिलना सबसे अधिक सुकुन देता था। मगर इस ठण्ड के मौसम में छुट्टी मिलने के अलग अलग कारण होते थे जो सबसे अनोखे और मज़ेदार होते। हमें पता भी नहीं  चलता  था की आज कौन सी क्लास नहीं होगी और कौन सी होगी , कभी किसी मास्टर साहेब को इतनी ठण्ड लगती की वो अलाव जला कर बैठ जाते और दूसरे टीचरों के साथ गप्पे हांकते तो कभी किसी मैडम की ठिठुरन स्टाफ रूम में कॉफी पीते पीते जाती। इस मौसम से दिनचार्य में बदलाव आना तो स्वाभाविक था परन्तु एक अलग सी  दैनिक-संस्कृति भी थी जो अब तेज़ी से रेडीमेड हो गयी है  , ठण्ड के आने से पहले और ठण्ड के जाते-जाते तक , हरी , नीली पिली कई रंगों वाले मुलायम ऊनों के 'बुनते हुए स्वेटर' भी हमारी क्लास में पढाई न होने का सबसे अनोखी वजह बनती थीं। मैडम ने क्लास मे...

मोहल्ले में उड़नखटोला

अपने शहर की एक बात बताता हूँ, माफ़ की जीयेगा मोहल्ले के बच्चों की एक बात बताता हूँ , जब कभी गर्र गर्र की आवाज़ आती , मतलब कोई हवाईजहाज़ आसमन में गुर्राते हुए हमारे आँगन के ऊपर से बेफिक्र उड़ता ,तब सारे काम छोड़ कर हम हवाईजहाज़ के पीछे पीछे भागने लगते , चिल्लाते , आसमान की तरफ हाथ हिला हिला कर 'टाटा' करते , देर तक आसमान की ओर ही ताकते रहते , फिर सब को बताते फिरते और जो कोई नहीं देख पाया हो उसे चिढाते....!!! हमें वक़्त बे-वक़्त ये ख़ुशी मिलती रहती , हाँ, कभी कभी ये ज़्यादा भी हो जाती थी जब चुनाव आते थे मगर फिर भी ऐसा कभी नही होता था की कोई उड़ानखटोला हमारे मोहाले के आसमान से गुज़रे और हमारी गर्दन ऊपर नहीं हुई हो....चाहे घर के जिस कोने में हो। उस उड़नखटोले में बैठ कर मोहल्ले का हर बच्चा शहर से दुर्र कंही उड़ जाना चाहता था और मुझे भी ये उम्मीद दिल में आगयी थी की एक दिन ये मेरे छत पर ज़रूर उतरेगा या रस्सी फेकेगा और मैं फिर लोगों को टाटा -बाय बाय करता हुआ उड़ जाऊंगा , मुझे ऐसी जगह ले जायेगा जँहा इस हवाईजहाज़ के माँ - बाप होंगे , उसका घर होगा , भाई बहन होंगे , कितना मज़ा आएगा। …मैं सबसे ...

किसान के बाद अब जवान की बारी।

जब 1965 में जनता को राम लीला मैदान में सम्बोधित करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने "जय जवान जय किसान" का नारा दिया था, तब हमारे समकालीन प्रधानमंत्री सम्भवता युवा अवस्था के समीप होंगे और इस नारे के प्रभाव को समय के साथ साथ उन्होंने ने भी अनुभव तो किया ही होगा।  इस नारे को शास्त्री जी द्वारा उस समय देने के पीछे सीमा सुरक्षा और आर्थिक समस्या जैसे कारन होंगे परन्तु ये नारा पुरे भारत भर में एक नयी ऊर्जा का संचार करने में सफल रही थी।  चाहे कारगिल का युद्ध हो या अनाज की कमी की समस्या , हमरे जवानो और किसानो ने अपने रक्त को नीर के भांति बहाते हुए दोनों समस्याओं को हल किया परन्तु आज पचास साल बाद वही जवान "वन रैंक वन पेंशन" की मांग को लेकर 12 जून से आंदोलन कर रहा है और सरकार तारीख पर तारीख देती जा रही है, वंही दूसरी ओर किसान आत्महत्या कर रहा है और सरकार महज इसे एक सयोंग मानती है। तीनो सेनाओं के पूर्व दस जनरलों ने प्रधानमंत्री को खुला पात्र लिखा है की आखिर वन रैंक वन पेंशन को लागु करन...

How an Innovative plan change into jumla ?

I do not know the meaning of 'Make in India' , actually i failed to understand it in past one year, But you might be able to appreciate it . According to our government policy 'Make in India' sense as a : A MAJOR NEW NATIONAL PROGRAM. DESIGNED TO FACILITATE INVESTMENT. FOSTER INNOVATION. ENHANCE SKILL DEVELOPMENT. PROTECT INTELLECTUAL PROPERTY. AND BUILD BEST-IN-CLASS MANUFACTURING INFRASTRUCTURE. THERE'S NEVER BEEN A BETTER TIME TO MAKE IN INDIA. If you remember about a year ago from today, 15th August 2014 from the Laal Qila , our honourable prime minister announced 'Make in India' plan. After this national festival, our prime minister literally changed their working strategy or taking charge of foreign ministry, sorry ! it's means he started taking official trip to all leading manufacturing countries of the world, B etween all this trip or bla-bla , Finance ministries launches India,s upcoming growth rate or estimated gdp.  (5.4-5.9%) it's so...

पहचान

          रास्ते के किनारे , बस स्टॉप से ठीक पहले , शिकंजी के ठेले के पास एक अधेड़ उम्र का दढ़ियल आदमी ,  इत्र में डुबोई रुई कान में खुँसी हुई जो अब पिली पर चुकी है ,  कुर्ता का दामन मैला और आस्तीन कोहनी तक मुड़ी हुई  , सर-सर  शिकंजी पिए जा रहा था और जब उसने देखा की दो लड़के उसे गौर से देख रहे हैं तो वो धीरे धीरे सुर-सुराने लगा।           बस स्टॉप पर रोज़ाना कई लोग इसी तरह एक दूसरे को निहार लेते हैं , और निहारते -निहारते उस इंसान का पहचान पत्र बना लेते हैं और अगर बात विचार हो गया तो लो भाई 'बायोडाटा' भी तैयार।  बस को आने में अभी काफी समय था इसलिए वो दोनों लड़के उस आदमी की हालत का सरकारी जायज़ा माफ़ किजएगा ऊपरी जायज़ा ले रहे थे , "हाँ लगते तो ये काफी गरीब हैं" एक की बात पर तुरंत दूसरे ने झट से कहा पर यंहा इस बस स्टॉप पर अमीर कौन है  हम्म , ये भी सही बात है, इतनी धुप में बस पकरने की अमीरों को क्या ज़रूरत।  पहनावे और दिखने से तो यही 'बटला हाउस' साइड के लगते हैं  नहीं यार, रहने वाले तो ये भी ह...

ये जो फैंस हैं कुछ नहीं जानती हैं।

         समाचारों के सम्पादकीय पढ़ कर समाचार पत्र  खरीदने का दौर अब नहीं रहा । समाचार पत्रों की साज-सज्जा उसमें छपे सामग्री से ज़्यादा महत्व  पाने लगी है। मीडिया के सभी मंचों का यही हाल है , फिल्में भी कहानी और अभिनय के बजाए स्टारडम की वजह से चलती हैं। न्यूज़ चैनलों के एंकरों का भी अब अपना एक  'फैन फॉलोइंग' है ,भई , जिसके बल बुते वह न्यूज़ एंकर अपने ख़बरों को धरा-धर  बेच रहा है। सभी मीडिया वर्ग ने समाज में अपना अपना 'फैन फॉलोवर' बना रखा है। आज ख़बरों की प्रमाणिकता और निष्पक्षता से किसी भी 'फैन' को कोई मतलब नहीं है की वो कितनी सही है या ये एंकर जो बोल रहा है वह वास्तविकता है या नहीं । कोल्हू के बैल की तरह , मीडिया में हांकने वाले , माफ़ किजएगा , मीडिया की गाड़ी को हांकने वाले हमें हाँक रहे हैं। न्यूज़ एंकर आज 'सेल्समैन' बन कर अपनी बातों को दर्शकों पर थोपता है और दर्शक जो खरीदार नहीं बन पाया है वो आसानी से थोपा जाता है और खरीदार-दर्शक 'मुफ्त होम डिलीवरी ' के चक्कर में अक्सर ठगा जाता है , ...

मुज़फ्फरनगर नहीं मुजफ्फरपुर।

'दोस्त दोस्त न रहा, प्यार प्यार न रहा'  ये पंक्तियाँ मुजफ्फरपुर के दो दोस्तों के संबंधों पर सटीक बैठती है जब भारतेंदु और विक्की ( सदाकत अली ) की जिगरी दोस्ती में परी खटास ने अंत में एक सांप्रदायिक दंगे का रूप ले लिया था। इस साल के प्रारम्भ में ही मुजफ्फरपुर के अज़ीज़पुर कसबे में दो परिवारों की आपसी मन-मुटाव ने कई जाने ले ली और अज़ीज़पुर छेत्र  को हिंसा का गवाह बनते हुए अपमान का घूट पीना परा। दो सप्ताह ,मुजफ्फरपुर जिला में और उसके आस पास के इलाके में निरंतर उपद्रव का माहोल बना रह।       ' हंगामा है क्यों बरपा '- हुआ कुछ यूँ की भारतेंदु और विक्की तो मित्र थे ही उनकी बहनों के बीच भी अच्छी मित्रता थी , पारिवारिक सम्बन्ध भी दोनों घरों के बीच बरसों से था जो की अमूमन हर छोटे कसबे में एक परिवार का दूसरे परिवार से होता है हर धार्मिक संवेदना को दूर रख कर। भारतेंदु और विक्की की बहन के बीच जब प्रेम - प्रसंग की बात सामने आई तब सारे पुराने सम्बन्ध दो क्षणो में ध्वस्त हो गए। भारतेंदु ने अपने प्रेम के लिए जान गँवाई , वंही दूसरी और भारतेंदु ...

अभी आज़ादी बाकि है।

            जब हम किसी विषेय पर सोचते हैं , और विषय का अर्थ और भाव  अगर समझ में नहीं आ रहा हो तो उसे समझने के  लिए उस विषय को अपने घर के फर्श पर बिछा कर सोचना चाहिए। महिला सशक्तिकरण को समझते समय ऐसा ही हुआ , जब प्रोफ़ेसर साहब इस विषय को समझा रहे थे, कि आखिर क्यों आज़ादी के सड़सठ साल बाद भी महिलओं को सशक्तिकरण की आवश्यकता है तो मैं काफी खुश था की महिलाओं के साथ जिस तरह का बुरा व्यवहार समाज में हो रहा है वो हमारे घर की औरतों के साथ तो कतई नहीं होता है। मेरे कई साथी भी खुश थे की महिला सशक्तिकरण तो हमारे घर में बरसों से  रची -बसी हुई है , अम्मी पूरा घर संभालती हैं , बाज़ार  जाती हैं , उन्होंने हमें पढ़ाया भी है , और बहनो के साथ भी सुब कुछ सामान्य है  , वो अपने सारे काम कर लेती हैं , कॉलेज के फॉर्म भरने से लेकर , बैंकों में पैसा जमा करने तक तो कोई रोक टोक  नहीं है।             कुछ पुरुष वर्ग इस लिए भी खुश ह...