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Showing posts from April, 2015

ये जो फैंस हैं कुछ नहीं जानती हैं।

         समाचारों के सम्पादकीय पढ़ कर समाचार पत्र  खरीदने का दौर अब नहीं रहा । समाचार पत्रों की साज-सज्जा उसमें छपे सामग्री से ज़्यादा महत्व  पाने लगी है। मीडिया के सभी मंचों का यही हाल है , फिल्में भी कहानी और अभिनय के बजाए स्टारडम की वजह से चलती हैं। न्यूज़ चैनलों के एंकरों का भी अब अपना एक  'फैन फॉलोइंग' है ,भई , जिसके बल बुते वह न्यूज़ एंकर अपने ख़बरों को धरा-धर  बेच रहा है। सभी मीडिया वर्ग ने समाज में अपना अपना 'फैन फॉलोवर' बना रखा है। आज ख़बरों की प्रमाणिकता और निष्पक्षता से किसी भी 'फैन' को कोई मतलब नहीं है की वो कितनी सही है या ये एंकर जो बोल रहा है वह वास्तविकता है या नहीं । कोल्हू के बैल की तरह , मीडिया में हांकने वाले , माफ़ किजएगा , मीडिया की गाड़ी को हांकने वाले हमें हाँक रहे हैं। न्यूज़ एंकर आज 'सेल्समैन' बन कर अपनी बातों को दर्शकों पर थोपता है और दर्शक जो खरीदार नहीं बन पाया है वो आसानी से थोपा जाता है और खरीदार-दर्शक 'मुफ्त होम डिलीवरी ' के चक्कर में अक्सर ठगा जाता है , ...

मुज़फ्फरनगर नहीं मुजफ्फरपुर।

'दोस्त दोस्त न रहा, प्यार प्यार न रहा'  ये पंक्तियाँ मुजफ्फरपुर के दो दोस्तों के संबंधों पर सटीक बैठती है जब भारतेंदु और विक्की ( सदाकत अली ) की जिगरी दोस्ती में परी खटास ने अंत में एक सांप्रदायिक दंगे का रूप ले लिया था। इस साल के प्रारम्भ में ही मुजफ्फरपुर के अज़ीज़पुर कसबे में दो परिवारों की आपसी मन-मुटाव ने कई जाने ले ली और अज़ीज़पुर छेत्र  को हिंसा का गवाह बनते हुए अपमान का घूट पीना परा। दो सप्ताह ,मुजफ्फरपुर जिला में और उसके आस पास के इलाके में निरंतर उपद्रव का माहोल बना रह।       ' हंगामा है क्यों बरपा '- हुआ कुछ यूँ की भारतेंदु और विक्की तो मित्र थे ही उनकी बहनों के बीच भी अच्छी मित्रता थी , पारिवारिक सम्बन्ध भी दोनों घरों के बीच बरसों से था जो की अमूमन हर छोटे कसबे में एक परिवार का दूसरे परिवार से होता है हर धार्मिक संवेदना को दूर रख कर। भारतेंदु और विक्की की बहन के बीच जब प्रेम - प्रसंग की बात सामने आई तब सारे पुराने सम्बन्ध दो क्षणो में ध्वस्त हो गए। भारतेंदु ने अपने प्रेम के लिए जान गँवाई , वंही दूसरी और भारतेंदु ...

अभी आज़ादी बाकि है।

            जब हम किसी विषेय पर सोचते हैं , और विषय का अर्थ और भाव  अगर समझ में नहीं आ रहा हो तो उसे समझने के  लिए उस विषय को अपने घर के फर्श पर बिछा कर सोचना चाहिए। महिला सशक्तिकरण को समझते समय ऐसा ही हुआ , जब प्रोफ़ेसर साहब इस विषय को समझा रहे थे, कि आखिर क्यों आज़ादी के सड़सठ साल बाद भी महिलओं को सशक्तिकरण की आवश्यकता है तो मैं काफी खुश था की महिलाओं के साथ जिस तरह का बुरा व्यवहार समाज में हो रहा है वो हमारे घर की औरतों के साथ तो कतई नहीं होता है। मेरे कई साथी भी खुश थे की महिला सशक्तिकरण तो हमारे घर में बरसों से  रची -बसी हुई है , अम्मी पूरा घर संभालती हैं , बाज़ार  जाती हैं , उन्होंने हमें पढ़ाया भी है , और बहनो के साथ भी सुब कुछ सामान्य है  , वो अपने सारे काम कर लेती हैं , कॉलेज के फॉर्म भरने से लेकर , बैंकों में पैसा जमा करने तक तो कोई रोक टोक  नहीं है।             कुछ पुरुष वर्ग इस लिए भी खुश ह...