समाचारों के सम्पादकीय पढ़ कर समाचार पत्र खरीदने का दौर अब नहीं रहा । समाचार पत्रों की साज-सज्जा उसमें छपे सामग्री से ज़्यादा महत्व पाने लगी है। मीडिया के सभी मंचों का यही हाल है , फिल्में भी कहानी और अभिनय के बजाए स्टारडम की वजह से चलती हैं। न्यूज़ चैनलों के एंकरों का भी अब अपना एक 'फैन फॉलोइंग' है ,भई , जिसके बल बुते वह न्यूज़ एंकर अपने ख़बरों को धरा-धर बेच रहा है। सभी मीडिया वर्ग ने समाज में अपना अपना 'फैन फॉलोवर' बना रखा है। आज ख़बरों की प्रमाणिकता और निष्पक्षता से किसी भी 'फैन' को कोई मतलब नहीं है की वो कितनी सही है या ये एंकर जो बोल रहा है वह वास्तविकता है या नहीं । कोल्हू के बैल की तरह , मीडिया में हांकने वाले , माफ़ किजएगा , मीडिया की गाड़ी को हांकने वाले हमें हाँक रहे हैं। न्यूज़ एंकर आज 'सेल्समैन' बन कर अपनी बातों को दर्शकों पर थोपता है और दर्शक जो खरीदार नहीं बन पाया है वो आसानी से थोपा जाता है और खरीदार-दर्शक 'मुफ्त होम डिलीवरी ' के चक्कर में अक्सर ठगा जाता है , ...