मुझे याद है जब कैसेट और टेप रिकॉर्डर की धूम चल रही थी भारतीय घरों में तब मेरे पिताजी की अलमारी में ग़ज़लों , कव्वालियां और नज़्मों की बेहतरीन संग्रह हुआ करती थी , जिसे हम उस समय न चाहते हुए भी सुनने को मजबूर थे , ग़ज़लों और कवलियों से नौ वर्ष के लड़के को क्या मोह , तो बस जैसे ही टेप रिकॉर्डर के बजने की आवाज़ आती , मैं धीरे से अपना बल्ला और गेंद ले कर सहन में खेलने निकल जाता था। क्योंकि पिताजी अक्सर ये ग़ज़लें और क़व्वाली सुनते वक़्त आराम करते , जिससे हमें खेलने का मौका मिल जाता था। इस तरह से उस लाल-पिली रौशनी वाले टेप रिकॉर्डर का बहुत बड़ी किृपा रही है हमारे घर के सभी बच्चों पर। हमारी शोर और किसी के पुकारने की आवाज़ दोनों ही टेप की आवाज़ में गायब हो जाते थे। उस दिन जब शायद रविवार था , और बरामदे में हम बच्चों की टीम अपने बल्ले - गेंद और अन्य दूसरे खेलों में व्यस्त थी तभी ही अचानक एक आवाज़ ने हम सभी के खेलों को थोड़े देर के लिए रोक दिया , ये क्या था ? ऐसी आवाज़ की तो हमने कल्पना भी नहीं की थी , इस वक़्त पिताजी अक्सर ग़ज़ल ही सुनते थे , ग़...