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मोहल्ले में उड़नखटोला

अपने शहर की एक बात बताता हूँ, माफ़ की जीयेगा
मोहल्ले के बच्चों की एक बात बताता हूँ , जब कभी गर्र गर्र की आवाज़ आती ,
मतलब कोई हवाईजहाज़ आसमन में गुर्राते हुए हमारे आँगन के ऊपर से बेफिक्र उड़ता ,तब सारे काम छोड़ कर हम हवाईजहाज़ के पीछे पीछे भागने लगते , चिल्लाते , आसमान की तरफ हाथ हिला हिला कर 'टाटा' करते , देर तक आसमान की ओर ही ताकते रहते , फिर सब को बताते फिरते और जो कोई नहीं देख पाया हो उसे चिढाते....!!!
हमें वक़्त बे-वक़्त ये ख़ुशी मिलती रहती ,
हाँ, कभी कभी ये ज़्यादा भी हो जाती थी जब चुनाव आते थे मगर फिर भी ऐसा कभी नही होता था की कोई उड़ानखटोला हमारे मोहाले के आसमान से गुज़रे और हमारी गर्दन ऊपर नहीं हुई हो....चाहे घर के जिस कोने में हो।
उस उड़नखटोले में बैठ कर मोहल्ले का हर बच्चा शहर से दुर्र कंही उड़ जाना चाहता था और मुझे भी ये उम्मीद दिल में आगयी थी की एक दिन ये मेरे छत पर ज़रूर उतरेगा या रस्सी फेकेगा और मैं फिर लोगों को टाटा -बाय बाय करता हुआ उड़ जाऊंगा , मुझे ऐसी जगह ले जायेगा जँहा इस हवाईजहाज़ के माँ - बाप होंगे , उसका घर होगा , भाई बहन होंगे , कितना मज़ा आएगा। …मैं सबसे मिलूंगा और वापस आकर लोगों को कहानियां सुनाऊंगा। कुछ दिन बाद।
गर्दन सीधी करके देखने का भी एक दिन आही गया जब पहली दफा हेलीकाप्टर देखा था पास के मैदान में ही उतरा था , सब दौर गए थे .. अब पता नहीं किसको देखने दौरे थे ...खैर हम तो हेलीकाप्टर देखने गए थे
दौरते भागते..बेतहाशा ..इस डर के साथ की कंही वापस न उड़ जाये ..l
और जब देखा तो बस देखते रहे ...सांसे फूल रही थीं मगर चिल्लाये जा रहे थे , उस वक़्त जो ख़ुशी थी उसकी कोई सेल्फी नहीं है हमारे पास ,...बस ऐसा सकून और ख़ुशी थी की मानो भारत ने 2003 का वर्ल्ड कप वापस जीत लिया हो।

चारों ओर घूमते रहे उसके , खूब शोर मचाया। पता नहीं इससे भाषण देने आये नेता को क्या लगा हो। उसे जो भी गलत फहमी हुई हो , भाई हम तो हेलीकाप्टर के दीवाने थे। वो हेलीकाप्टर जिसे हम हवा में उड़ते देखते हैं , जो लोगों को एक देश से दूसरे देश ले जाता है , जो किसी भी अनजान जगह जा सकता है , वो आज हमारे मोहल्ले में था और खामोश बैठा था ..... क्या हेलीकाप्टर को पता था की वो हमरे मोहल्ले में है ?
हम उसे छूना चाहते तो मैदान का गॉर्ड डपट देता और लाठी से डराता था पर मारता नहीं था किसी को..... वो भी आराम से हेलीकाप्टर को निहारने की कोशिस करता मगर तुरंत उसे किसी न किसी को डांटना पड़ता था।
थोड़ी देर बाद हमें उसकी ख़ामोशी का एहसास हो गया …… अब हम चाहते थे की वो उड़ उड़ कर हमें दिखाए,,, उसकी डोर हमरे हाथ में हो और हम पेंच लड़ाए मगर वो खामोश रहा। फिर हमें ये पता चला की सच में इस हेलीकाप्टर को आदमी उड़ाते हैं तो मन ने ये बात काबुल नहीं की ऐसे कैसे आदमी उडाता है , ये न आदमियों को हवा में शैर करता है जी। मगर फिर ये बात हम भूल कर हो हल्ला करने लगे।
जब काफी देर बाद भाषण खत्म हुआ तो कुछ लोग उसमें आकर बैठ गए।
हमने खूब शोर मचाया जब उसकी पंखी ने नाचना शुरू किया। तालियां बजने लगीं तो हमने भी बजायी पर हेलीकाप्टर की शान में , बहोत प्यारा था वो , हरे रंग से रंगा हुआ और काले रंग की उसकी दुम थी ,शीशे के दो आँख थे बड़े बड़े अब्बा के आँखे जैसी मगर हंसमुख लग रहे थे। अब हम उसकी पंखी को छूना चाहते थे जो इतनी तेज़ नाच रही थी की नज़र नहीं आरही थी।
पर भीड़ इतनी थी की हिलना भी मुश्किल हो चला था मगर छोटे होने का ये भी फ़ायदा है की किसी के भी टांगों के अंदर से निकल जाओ सो हम निकल गए और पंहुच गए घेरे में अब हम उसके और करीब थे , आँखे हवा के झोके से पूरी खुल नहीं पा रही थी , मैं दोनों हाथों को हिलाये जा रहा था , हाथ तेज़ी से इधर उधर घूम रहे थे , कुछ नज़र नहीं आ रहा था , हवा और धूल एक साथ नाच रहे थे , मैं चिल्लाता हुआ आगे दौरा "हेलीकाप्टर हेलीकाप्टर " , मेरे हाथ किसी के टांगों तक ही पड़े और फिर और सारे टांगों पर, मैंने हाथ मारा और धक्का खा कर गिर गया फिर आँख खुली तो देखा की मेरा हेलीकाप्टर हवा में उड़ा जा रहा था , सब चिल्ला रहे थे और मैं एक आँख बंद किये कनखी आँखों से उसे देख रहा था।


आज इतने सालों बाद , जब कभी किसी उड़नखटोले की आवाज़ कानों में परती है तो गर्दन अपने आप ऊपर हो जाता है और मन करता है की एक बार चिल्ला दूँ " होए हवाईजहाज़ , हवाईजहाज़ , वो देखो हवाईजहाज़ "
मगर........ खामोश रहता हूँ।।।।।।।



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