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अभी आज़ादी बाकि है।

            जब हम किसी विषेय पर सोचते हैं , और विषय का अर्थ और भाव  अगर समझ में नहीं आ रहा हो तो उसे समझने के  लिए उस विषय को अपने घर के फर्श पर बिछा कर सोचना चाहिए। महिला सशक्तिकरण को समझते समय ऐसा ही हुआ , जब प्रोफ़ेसर साहब इस विषय को समझा रहे थे, कि आखिर क्यों आज़ादी के सड़सठ साल बाद भी महिलओं को सशक्तिकरण की आवश्यकता है तो मैं काफी खुश था की महिलाओं के साथ जिस तरह का बुरा व्यवहार समाज में हो रहा है वो हमारे घर की औरतों के साथ तो कतई नहीं होता है। मेरे कई साथी भी खुश थे की महिला सशक्तिकरण तो हमारे घर में बरसों से  रची -बसी हुई है , अम्मी पूरा घर संभालती हैं , बाज़ार  जाती हैं , उन्होंने हमें पढ़ाया भी है , और बहनो के साथ भी सुब कुछ सामान्य है  , वो अपने सारे काम कर लेती हैं , कॉलेज के फॉर्म भरने से लेकर , बैंकों में पैसा जमा करने तक तो कोई रोक टोक  नहीं है।
            कुछ पुरुष वर्ग इस लिए भी खुश है की उसने अपने घर की महिलाओं को 'स्वतंत्रता' दे रखी है और महिलाएं भी इसी को स्वतंत्रता मान बैठी हैं ,  वास्तव में ये फर्जी स्वतंत्रता है जिसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है । क्योंकि  स्वतंत्रता देने वाले हाथ आज भी पुरुषों के ही  हैं , परिवार के मुखिया-पुरुष के हामी के बिना महिला अपने पंखों को हिला भी नहीं सकती। जन्म के समय से जो स्वतंत्रता पुरुषों को प्राप्त है वो महिलाओं को नहीं है। आज भी , कितना और कैसी स्वतंत्रता महिलाओं को मिले ये निर्धारित , उस महिला का बाप , भाई , पति , बेटा  और समाज ही करता है ।  उम्र के साथ-साथ जिस तरह स्वतंत्रता का छेत्र पुरुषों का बढ़ता है - ठीक उसके उलट महिलाओं के स्वतंत्रता के दायरे को बढ़ाने के बजाए छोटा कर दिया जाता है।
            आज 'स्वतंत्र' शब्द जब कोई लड़की पढ़ती होगी तो उसके मस्तिष्क में क्या घूमता होगा। वो अपने अनुभव से इसकी जो छवि बना पाती होगी,उसका पुरुष वर्ग कभी कल्पना भी नहीं कर सकता। आज स्वतंत्रता वो तरल है जो पुरुषों के लिए हमेशा बहती धारा के समान है, जो अपने मार्ग को खुद निर्धारित करती हुई चलती है मगर महिलओं के लिए उसी स्वतंत्रता नामक तरल को  डरा कर , धमाका कर , बहला कर , फुसला कर , जमा दिया जाता है ताकि वो धारा का रूप न ले। स्वतंत्र  महिलाएं कंही पुरुषों से अपने अधिकार की मांग न करने लगे इसलिए पुरुषों द्वारा उनकी सुंदरता को ही महत्व दिया जाने लगा , महिलओं की सुंदरता को उनका हतियार , दौलत आदि बताया जाने लगा ताकि महिलाऐं आपस में ही प्रतियोगिता करती रहें। आज जो एक -दो  महिलओं के नाम हम गर्व से ले पाते हैं -ये वही औरतें हैं जो इस फर्जी प्रतियोगिता से अलग हो पायीं और  'जमे' रहने से इंकार किया।
             हमारे परिवारों में आज भी जो महत्वपूर्ण निर्णय लिया जाता है  वो सभी पुरषों का ही होता है । कुछ सवालों के जवाब ही इसे साबित करने के लिए काफी हैं - दिल्ली शिफ्ट क्यों हुए ? अब्बु ने कहा था।  मुंबई में नौकरी क्यों नहीं करते ? अब्बु नहीं मानेंगे।  बस से क्यों नहीं आती तुम ? भइया मना  करते हैं। अलग से रूम क्यों नहीं ले लेते ? अब्बु ने कहा है चाचा के घर रहने के लिए। थोड़े बाल बढ़ाओ , यार ? अब्बु देखेंगे तो मेरी खैरियत नहीं। हमें तो पता भी नहीं होता की अम्मी को हमारे बड़े बाल पसंद है भी की नहीं। उनके निर्णय छमता को हमने जाना ही नहीं और वो इस लायक नहीं हैं ये समझ लिया। उन्हें घर के बहार जाने से हमने डराया है।  उन्हें खुश रखने के लिए एक ज़िम्मेदारी दी रसोई की। वो बस रसोई में सभी के पसंद का खाना बना कर खुश हैं।  हाँ , बाजार से घर के लिए चादर , परदे , बर्तन वग़ैरा खरीद कर संतुष्ट हैं , कभी अब्बु के लिए लुंगी तो मेरी लिए टी-शर्ट खरीद लाती  हैं , जो की मुझे कभी छोटी तो कभी बड़ी हो जाती है। 

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