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Showing posts from 2016

अमरुद किसने तोरा

मेरे घर के चारो ओर ऊँचे ऊँचे माकन थे , दो चार मंज़िल वाले।  केवल हमारा घर ही आधा करकट और आधा छत वाला था अब भी है। घर की छत से भी सिर्फ दूसरों के माकन ही नज़र आते थे खुला आकाश नहीं। घर के आँगन के कोने में ज़नाना गुसलखाने के पास लंबा , छरहरा और पुरी आँगन को छाव देने वाला 'एक अमरुद का पेड़ था।' इसी पेड़ की वजह से हमें अपने घर पर गरूर था , जिनके छत ऊँचे थे वो भी हमारे आँगन में अमरुद चुनने आया करते थे और कभी कभी तोड़ने भी। मौसम बे मौसम हम अमरुद और अमरुद के पेड़ का मज़ा लेते थे। ज़नाना गुसलखाने की दीवाल पर चढ़ कर अमरुद के तने पर बैठ जाना , फिर जंहा तक हाथ पहुंचे वंहा तक अमरुद तोड़ लेना बिना उसके कच्चे या पके होने का ज्ञात किये। यह ऐसा खेल था जो हमारे घर आया हर नया बच्चा खेला करता था। हम ये खेल अक्सर दिन में खेला करते थे क्योंकि तब घर की सभी औरतें आराम किया करती थी। तीन चार दिन से सब बच्चों की नज़र एक बड़े अमरुद पर थी , जो पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर था। हमसब बस इसी इंतज़ार में थे की कब और कैसे उसे तोडा जाए। पत्थर मार नहीं सकते थे क्योंकि हमारे छत करकट के थे , और ये ...

एक गीत सुना तो ऐसा लगा

मुझे याद है जब कैसेट और टेप रिकॉर्डर की धूम चल रही थी भारतीय घरों में तब मेरे पिताजी की अलमारी में ग़ज़लों , कव्वालियां और नज़्मों की बेहतरीन संग्रह हुआ करती थी , जिसे हम उस समय न चाहते हुए भी सुनने को मजबूर थे , ग़ज़लों और कवलियों से नौ वर्ष के लड़के को क्या मोह , तो बस जैसे ही टेप रिकॉर्डर के बजने की आवाज़ आती , मैं धीरे से अपना बल्ला और गेंद ले कर सहन में खेलने निकल जाता था।  क्योंकि पिताजी अक्सर ये ग़ज़लें और क़व्वाली सुनते वक़्त आराम करते , जिससे हमें खेलने का मौका मिल जाता था।  इस तरह से उस लाल-पिली रौशनी वाले टेप रिकॉर्डर का बहुत बड़ी किृपा रही है हमारे घर के सभी बच्चों पर। हमारी शोर और किसी के पुकारने की आवाज़ दोनों ही टेप की आवाज़ में गायब हो जाते थे। उस दिन जब शायद रविवार था , और बरामदे  में हम बच्चों की टीम अपने बल्ले - गेंद और अन्य दूसरे खेलों में व्यस्त थी तभी ही अचानक एक आवाज़ ने हम सभी के खेलों को थोड़े देर के लिए रोक दिया , ये क्या  था ? ऐसी आवाज़ की तो हमने कल्पना भी नहीं की थी , इस वक़्त पिताजी अक्सर ग़ज़ल ही सुनते थे , ग़...

गुरु गोविन्द सा मिला

जैसे ही नोटिस बोर्ड पर सब्सिडियरी सब्जेक्ट की लिस्ट देखी मेरे तो पैरों के निचे से ज़मीं निकल गयी , यूनिवर्सिटी में प्रवेश पाने के बाद यंहा के नए माहौल से ताल मेल बैठाने और पढाई में बेहतर करने का मेरा उद्देश्य भष्म होता दिखाई दिया क्योंकि 'हिंदी साहित्य का इतिहास ' मेरे सब्सि पेपर का विषय बन गया था और इस से पहले मैंने हिंदी को विषय के तौर पर पांच साल पहले आठवीं में पढ़ा था , तब भी मैं हिंदी भाषा में अतयन्त कमज़ोर छात्र था , न ही व्याकरण का ज्ञान था न ही वर्तनी का , चालीस , पैंतालीस से ज़्यादा अंक कभी ला नहीं पाया , बस इन्ही पृष्ठभूमि के साथ मैं नोटिस बोर्ड के सामने ही नि:शब्द खड़ा रहा।  सब्सि की पहली कक्षा में ही ये आभास हो गया था की मैं इस विषय में तो ज़रूर ही फ़ैल होने वाला हूँ क्योंकि पहली क्लास में गुरु देव के वाणी का कुछ भी रस मेरे भुद्धि में नहीं पंहुचा।  एक  , दो क्लास मैंने यूँही ही गुरुदेव से खुद को छिपाते हुए पूरा किया , कहते हैं न डूबते को तिनके का सहारा पर मुझे तो पूरी की पूरी नौका ही मिल गयी और ये" नौका" मुझे मिली...

देवी अब बेचीं जाती है

एक औरत थी , उसके पास अद्भुत शक्ति थी , वो सच और झूट तुरंत पकर लिया करती  , कोई भी तथ्य उसके सामने छुपे नहीं रह पाते थे , इसलिए उसके पास दूर-दूर से लोग अपना-अपना  'मामला'  ले कर आते और वो तुरंत सारे सच और झूट पता कर लेती , उसकी इस शक्ति की खबर पुरे समाज में फैल गयी। अपनी अपनी परेशानी लिए लोगों की भीड़ रोज़ रोज़ आने लगी , लोगों को रोज़ की माथा-पच्ची  से राहत  मिल गयी , अब तो कोई भी एक छोटा सा मसला भी अगर फँस जाता तो लोग आपसी सहमति से सुलझाये बिना सीधा देवी के चरणों में आ गिरते , एक दूसरे का झूट पकरने की होड़ सी समाज में लग गयी थी।    फिर एक दिन कमला बाबू ने देवी के घर के पास पान की दुकान खोली , पान की दुकान के सामने आवसीय होटल खुल गया , चार पांच लौंडे लपाटे  भी अपनी जेब भरने के खातिर भीड़ को मैनेज करने लगे , इसी में कोई किसी पक्ष से मोटी रकम ले कर देवी से पहले मिलवा देता तो जो एक रोकड़ा भी नहीं दे पाते उसकी बारी को ये अाने नहीं देते , भाड़ी संख्या में ...

तरक्की

मज़ार के बगल से नहर बहती थी नहर के उस पार शहर था जिस गावों में मज़ार था वहाँ के लोग रोज़गार के खातिर कभ कभी नहर पार किया करते थे, शहर से भी मज़ार की ज़ियारत के लिए कुछ लोग कभी कभी आ जाया करते थे , फिर धीरे धीरे उस नहर पर पुल बना दी गयी शहर अचनक बढ़ने लगे.! उधर मज़ारों की संख्या भी बढ़ने लगी , बस नहर नहीं बढ़ी।