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बुनी हुई क्लास


छात्र जीवन में या यूँ कहें की स्कूली जीवन में सबसे अधिक आनंद तब आता था जब स्कूल बंद हो , मास्टर साहब न आएं हो , स्कूल बस छूट गयी हो , या  फिर किसी आकस्मिक घटना की वजह से छुट्टी हो गयी हो यानी की वजह कोई भी हो बस पढाई से मुक्ति मिलना सबसे अधिक सुकुन देता था।
मगर इस ठण्ड के मौसम में छुट्टी मिलने के अलग अलग कारण होते थे जो सबसे अनोखे और मज़ेदार होते। हमें पता भी नहीं चलता था की आज कौन सी क्लास नहीं होगी और कौन सी होगी , कभी किसी मास्टर साहेब को इतनी ठण्ड लगती की वो अलाव जला कर बैठ जाते और दूसरे टीचरों के साथ गप्पे हांकते तो कभी किसी मैडम की ठिठुरन स्टाफ रूम में कॉफी पीते पीते जाती।
इस मौसम से दिनचार्य में बदलाव आना तो स्वाभाविक था परन्तु एक अलग सी  दैनिक-संस्कृति भी थी जो अब तेज़ी से रेडीमेड हो गयी है  , ठण्ड के आने से पहले और ठण्ड के जाते-जाते तक , हरी , नीली पिली कई रंगों वाले मुलायम ऊनों के 'बुनते हुए स्वेटर' भी हमारी क्लास में पढाई न होने का सबसे अनोखी वजह बनती थीं।
मैडम ने क्लास में आते ही गाय पर लेख लिखने को दे दिया और ऊनों की गुत्थी सुलझाने लगी।  उस लेख में किसी ने गाय को पालतू बताया तो किसी ने "माता" तो किसी ने उसे कई रंगों वाली चौपाया जानवर और कुछ तो बच्चे बिलकुल ही गाय बन कर आराम करते क्योंकि लेख लिखो न लिखो कुछ फर्क नहीं पड़ता था मैडम जी को स्वेटर बुनने से छुट्टी नहीं मिलती थी। ये किस्सा लगभग सभी कक्षाओं में होता था।
इन किस्सों  के दौरान ही हमारी एक मैडम ने बताया की जब वो कुंवारी थी और ऊन से बुनाई करना सिख रही थी तब उन्होंने ने अपने बड़े भाई के लिए स्वेटर बुना था जो नीले  और सफ़ेद रंगों के ऊनों का था ये रंग इतने अनोखे थे की वो मेरे भैया के पहचान ही बन गए थे , जब वो कॉलेज में एडमिशन लेने गए थे तब उनकी  पासपोर्ट साइज फोटो उसी स्वेटर में थी और जब वो डिग्री ले कर आये तो उस डिग्री पर जो उनकी फोटो थी वो भी उसी स्वेटर में थी जिसे देख कर वो आज भी अपने पिछले दिनों को याद किये बगैर नहीं रह पाती।
मेरी माँ ने बताया था की उन्होंने पहला  स्वेटर अपने अब्बा के लिए बुना था जिसे  पहन कर उनके अब्बा खेत पर जाया करते और कहते की इसे पहन कर मैं सौ साल जी सकता हूँ और जब  2004  में मेरे नाना का स्वर्गवास हुआ तब वो स्वेटर उनके बदन पर था। वो सौ साल तो नहीं जिए पर यक़ीनन अपनी बेटी द्वारा बुने  हुए स्वेटर पहन कर जो ख़ुशी के भाव उनके मन में आये होंगे वो सौ साल जीने से हरगिज़ काम नहीं हो सकते।
ऐसे ही न जाने कितने ही बेटियों ने अपना पहला बुना हुआ स्वेटर अपने अपने पिता को भेंट की होंगी , और वो पिता भी आज के युग के पिता से भाग्यशाली होंगे जिन्हे अपने माँ के हाथों का बुना हुआ ऊनी कपडा पहनने को तो मिला ही था  और अपने संतान के हाथों का बुना  भी मिला ।
ये बुने हुए मफलर , स्वेटर , टोपी आदि पहनने वाले की पहचान  अक्सर बन जाया करते थे , एक सी शर्ट और पैंट का अम्बार तो हमेशा ही लगा रहता है पर जब कोई मफलर दादी के बूढ़े हाथों से बुन कर आते हैं तो उसके रंग और बनावट पुरे बाजार में खोजने से नहीं मिलती , हर साल जाड़े में मैं वही पुरानी टोपी पहन लेता था फिर जब पिता ने नयी मफलर दिलाई तो महीनो उस मफलर से एक महक आती रही जो मेरे घर कि तो हरगिज़ नहीं थी और इसलिए मैं उसी पुरानी टोपी को ज़बरदस्ती अपने सर में अटाना चाहता था क्योंकि उसकी खुशबु मुझे किसी के 'गोद'  में ले जाती थी।
 लोग अपने इन ऊनी कपड़ों को बरसों किसी की याद में संजोये रखते थे और तब शायद इसलिए भी लोग अपनों और करीबियों के कपडे बखूबी पहचानते थे , अगर कोई पुरानी तस्वीर देखते वक़्त किसी का चेहरा भूल भी गए तो उसके शॉल से वो कौन सी बुआ जी हैं ये पहचान में आ जाती थीं।
मुझे तो अपनी दादी के हाथों की गर्म टोपी और चाची के हाथों का स्वेटर पहनना नसीब हो चूका अब ये पता नहीं की क्या कोई लड़की अपने प्रेमी के लिए आज भी स्वेटर पर दीपक बना रही होगी ,  या  क्या कोई बाप अपनी  बेटी के हाथों से बने हुए शॉल में खुद को लपेटे होगा , क्या अभी भी कोई अपनों की तस्वीरों में उसके कपड़ों को भी पहचान लेता है की इसे किसने बुना था "मामी ने या चाची ने"। क्या कोई बच्चा आज इसलिए भी खुश होगा की उसकी मैडम ने सब को गाय पर लेख लिखने को दिया है और अब वो लेख में गाय को पालतू बताये या वर्तमान राजनीती का मुद्दा , कोई फर्क नहीं परता  क्योंकि उसकी मैडम ऊनों की गुत्थी सुलझा रही है.... पूरी क्लास वो मैडम सिर्फ स्वेटर बुनते गुज़र देगी।
क्या ऐसा होता है आज भी ?




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