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Showing posts from December, 2014

गवैया

26 जनवरी 1951 को भारत में लोकतान्त्रिक शक्ति का गठन हुआ था , 1992 में आर्थिक शक्ति का , और 2014 में विकास के अनुरूप बदलाव का गठन हुआ है। पहले आम आदमी की शक्ति को चित कारते और राजधानी में राज्य - शक्ति का धरना देखा। फिर गठबंधन के पिछले तीस सालों के इतिहास को केंद्र में लोक द्वारा पलटते देखा।  मानो न मानो , इन दोनों पटखनी में एक ही रूप रेखा वाली लहर थी जिसे किसी ने देखा किसी ने नहीं देखा।  एक  'आम आदमी ' सुना रहा था तो दूसरा 'विकास '  लूटा रहा था। इन दोनों की पुकार को जनता का सहारा मिला , आम ख़ास बनता  गया और ख़ास आम बन गया। फिर तुरंत ही कुर्शी पर वज़न परा  जब सदन लोगों से खचाखच भरा। होने लगे बदलाव धराधर , कंही बिजली के बिल घटे तो कंही हुए पुराने राज्य पाल बहार। सत्ता की इस धूम में ख़ास बने इस आम को फौरन ही एक वचन याद आया , लोकपाल बिल की हठ ने उसे कुर्सी से उतरवाया। ....कौन गिरा , कौन टुटा , कौन गया ठग , यही सोच में खोया हूँ मैं अब तक। हाँ , सुसासन की जब बात चली तो प्रधानमंत्री ने उड़ान भरी। देश - विदेश में किया गुण गा...

फर्क रंग और धूल का

                               फर्क रंग और धूल का  हर राज्य हर शहर का अपना इतिहास है जो उसकी पहचान होती है। जिससे उसे चिन्हित किया जाता है।  इस चुनावी मौसम में तो हमारे नेताओं ने अपने प्रचार प्रसार के दौरान विभिन जगह की भाषा और वस्त्र का प्रयोग मंच पे किया ताकि वो अपना संबंध उस जगह से दिखा सके।  पर कुछ बातें जो हमेशा परेशान करती हैं की छेत्रिय भाषा , पहनावा और संस्कृति में तबदीली की वजह आखिर है क्या ? अपनी पहचान से आखिर क्यों भागते हैं हम  , क्या हमारी सभ्यता और संस्कृति इतनी कमज़ोर है की  दूसरों की संस्कृति हम पर हावी होती जा रही है। हिंदी बोलना और पढ़ना तो मनो इज़्ज़त पर ठप्पे लगने जैसा है।  वही हाल पहनावे का भी है।   बारहवीं उत्तीर्ण के बाद , मैं छोटे नगर की पगड़ी बांधे , कॉलेज में नामकन की जोत जगाये देश की धड़कन दिल्ली आ पहुंचा।  यंहा मौजूद मेरे जानने वालों में मेरी बुआ की बेट...