समाचारों के सम्पादकीय
पढ़ कर समाचार पत्र खरीदने का दौर अब नहीं रहा । समाचार पत्रों की
साज-सज्जा उसमें छपे सामग्री से ज़्यादा महत्व पाने लगी है। मीडिया के सभी
मंचों का यही हाल है , फिल्में भी कहानी और अभिनय के बजाए स्टारडम की वजह
से चलती हैं। न्यूज़ चैनलों के एंकरों का भी अब अपना एक 'फैन फॉलोइंग' है ,भई , जिसके बल बुते वह न्यूज़ एंकर अपने ख़बरों को धरा-धर बेच रहा है। सभी मीडिया वर्ग ने समाज में अपना अपना 'फैन फॉलोवर' बना रखा है। आज ख़बरों की प्रमाणिकता और निष्पक्षता से किसी भी 'फैन'
को कोई मतलब नहीं है की वो कितनी सही है या ये एंकर जो बोल रहा है वह
वास्तविकता है या नहीं । कोल्हू के बैल की तरह , मीडिया में हांकने वाले ,
माफ़ किजएगा , मीडिया की गाड़ी को हांकने वाले हमें हाँक रहे हैं। न्यूज़ एंकर
आज 'सेल्समैन' बन कर अपनी बातों को दर्शकों पर थोपता है और दर्शक जो खरीदार नहीं बन पाया है वो आसानी से थोपा जाता है और खरीदार-दर्शक 'मुफ्त होम डिलीवरी ' के चक्कर में अक्सर ठगा जाता है , तो कुछ खरीदार-दर्शक सेल्समैन' की 'टारगेट पालिसी' को जानते हैं , इसलिए उसे देखते ही अपना दरवाज़ा बंद कर लेते हैं और 'ऑनलाइन शॉपिंग' में लग जाते हैं ,और हम जो फैंस बन बैठे हैं , ये सोचते हैं की
सामने जो हमारा लोकप्रिय एंकर या रिपोर्टर बैठ कर कह रहा है वो ही सही है
बस बाकी तो जो कुछ है फ़िज़ूल है बकवास है , बाकी चैनल वाले तो बिके हुए
हैं।
हर दौर में 'फैन'
बनाना हमेशा फायदे का सौदा रहा है और फैन बनना हमेशा आधा फायदा रहा है।
क्योंकि महाशय , फैंस कभी भी सिक्के का दूसरा पहलु नहीं देख पाता है और फैंस बनाने वालों का आसानी से पॉकेट गरम होता है। अपने
मनपसंद चेहरे और साम्रगी का गुणगान करना उसकी आदत हो जाती है अब वो चाहे
नरेंद्र मोदी का फैन हो या केजरीवाल का या किसी अन्य का हो और इसका एक सत्य
ये भी है की आप अपने फैंस से कुछ भी नहीं सिख सकते और अगर सिख सकते तो फिर
सलमान खान अभिनय के चाणक्य हो जाते। खैर जाने दीजिये , अपनी प्रसंसा तो सभी
को अच्छी लगती है परन्तु जो अपनी प्रसंसा को भूलने में सक्षम होता है उसीकी प्रसंसा निरंतर हो पाती है और मीडिया को तो याद रखने की बड़ी पुरानी आदत है ,
इसलिए मीडिया में फैंस की जगह नही होनी चाहिए , वरना लोकप्रियता पाने की
इस होड़ में मीडिया की मृत्यु शीघ्र ही हो जाएगी। जैसा की हम देख रहे हैं
वर्तमान परिदृश्य में समाचार पत्रों को 'प्रचार पत्र ' और न्यूज़ चैनलों को 'व्यूज चैनल' कहना गलत नहीं होगा परन्तु इसके बावजूद सूचनाएं हम तक पहुँच रही है , ये सूचनायें दर असल में 'फ्राइड इनफार्मेशन' हैं। सूचनाओं को संपादक अपनी विचारधारा में 'फ्राई' करने के बाद हमें परोसता है और फ्राइड तो अधिकतम लोगों को अच्छी ही लगती है।
विद्या बालन का एक फ्लिम में संवाद है की "कुछ लोगों का नाम उनके काम से होता है , मेरा बदनाम होकर हुआ है"
इससे स्पष्ट है की लोकप्रियता का अपना कोई मापदंड नहीं है मगर फिर भी
प्रसिद्ध व्यक्ति, साम्रगी और रचनाओं का महत्त्व और उनकी प्रासंगिकता ही
लोकप्रियता का आधार होना चाहिए और इसके लिए हमें ये बात समझनी होगी की
लोकप्रिय व्यक्ति को हमेशा आलोचना की नज़र से देखना चाहिए तभी हम सिक्के का
दूसरा पहलु देख पाएंगे। अभी तक साहित्य, अभिनय, संगीत, और अन्ये कलाओं का
महत्व ही लोकप्रियता का मूल कारण
साबित होता आया है तभी तो कबीर हों या खुशरो , मुक्तिबोध हों या निराला ,
इनकी रचनाएँ अपनी प्रासंगिकता की वजह से सदा लोकप्रिय हैं और रहेंगी।
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