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Showing posts from September, 2016

अमरुद किसने तोरा

मेरे घर के चारो ओर ऊँचे ऊँचे माकन थे , दो चार मंज़िल वाले।  केवल हमारा घर ही आधा करकट और आधा छत वाला था अब भी है। घर की छत से भी सिर्फ दूसरों के माकन ही नज़र आते थे खुला आकाश नहीं। घर के आँगन के कोने में ज़नाना गुसलखाने के पास लंबा , छरहरा और पुरी आँगन को छाव देने वाला 'एक अमरुद का पेड़ था।' इसी पेड़ की वजह से हमें अपने घर पर गरूर था , जिनके छत ऊँचे थे वो भी हमारे आँगन में अमरुद चुनने आया करते थे और कभी कभी तोड़ने भी। मौसम बे मौसम हम अमरुद और अमरुद के पेड़ का मज़ा लेते थे। ज़नाना गुसलखाने की दीवाल पर चढ़ कर अमरुद के तने पर बैठ जाना , फिर जंहा तक हाथ पहुंचे वंहा तक अमरुद तोड़ लेना बिना उसके कच्चे या पके होने का ज्ञात किये। यह ऐसा खेल था जो हमारे घर आया हर नया बच्चा खेला करता था। हम ये खेल अक्सर दिन में खेला करते थे क्योंकि तब घर की सभी औरतें आराम किया करती थी। तीन चार दिन से सब बच्चों की नज़र एक बड़े अमरुद पर थी , जो पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर था। हमसब बस इसी इंतज़ार में थे की कब और कैसे उसे तोडा जाए। पत्थर मार नहीं सकते थे क्योंकि हमारे छत करकट के थे , और ये ...