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Showing posts from May, 2015

पहचान

          रास्ते के किनारे , बस स्टॉप से ठीक पहले , शिकंजी के ठेले के पास एक अधेड़ उम्र का दढ़ियल आदमी ,  इत्र में डुबोई रुई कान में खुँसी हुई जो अब पिली पर चुकी है ,  कुर्ता का दामन मैला और आस्तीन कोहनी तक मुड़ी हुई  , सर-सर  शिकंजी पिए जा रहा था और जब उसने देखा की दो लड़के उसे गौर से देख रहे हैं तो वो धीरे धीरे सुर-सुराने लगा।           बस स्टॉप पर रोज़ाना कई लोग इसी तरह एक दूसरे को निहार लेते हैं , और निहारते -निहारते उस इंसान का पहचान पत्र बना लेते हैं और अगर बात विचार हो गया तो लो भाई 'बायोडाटा' भी तैयार।  बस को आने में अभी काफी समय था इसलिए वो दोनों लड़के उस आदमी की हालत का सरकारी जायज़ा माफ़ किजएगा ऊपरी जायज़ा ले रहे थे , "हाँ लगते तो ये काफी गरीब हैं" एक की बात पर तुरंत दूसरे ने झट से कहा पर यंहा इस बस स्टॉप पर अमीर कौन है  हम्म , ये भी सही बात है, इतनी धुप में बस पकरने की अमीरों को क्या ज़रूरत।  पहनावे और दिखने से तो यही 'बटला हाउस' साइड के लगते हैं  नहीं यार, रहने वाले तो ये भी ह...