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अमरुद किसने तोरा



मेरे घर के चारो ओर ऊँचे ऊँचे माकन थे , दो चार मंज़िल वाले।  केवल हमारा घर ही आधा करकट और आधा छत वाला था अब भी है। घर की छत से भी सिर्फ दूसरों के माकन ही नज़र आते थे खुला आकाश नहीं। घर के आँगन के कोने में ज़नाना गुसलखाने के पास लंबा , छरहरा और पुरी आँगन को छाव देने वाला 'एक अमरुद का पेड़ था।' इसी पेड़ की वजह से हमें अपने घर पर गरूर था , जिनके छत ऊँचे थे वो भी हमारे आँगन में अमरुद चुनने आया करते थे और कभी कभी तोड़ने भी। मौसम बे मौसम हम अमरुद और अमरुद के पेड़ का मज़ा लेते थे। ज़नाना गुसलखाने की दीवाल पर चढ़ कर अमरुद के तने पर बैठ जाना , फिर जंहा तक हाथ पहुंचे वंहा तक अमरुद तोड़ लेना बिना उसके कच्चे या पके होने का ज्ञात किये। यह ऐसा खेल था जो हमारे घर आया हर नया बच्चा खेला करता था। हम ये खेल अक्सर दिन में खेला करते थे क्योंकि तब घर की सभी औरतें आराम किया करती थी।
तीन चार दिन से सब बच्चों की नज़र एक बड़े अमरुद पर थी , जो पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर था। हमसब बस इसी इंतज़ार में थे की कब और कैसे उसे तोडा जाए। पत्थर मार नहीं सकते थे क्योंकि हमारे छत करकट के थे , और ये भी डर रहता था की कोई अगर देख लेगा या सोते हुए आवाज़ सुन लेगा तो लेने के देने पर जायेंगे। बेवक़्त पढाई लिखाई की नसीहतें सुन्नी पर जाएँगी और हफ्ते भर तक के लिए मौज मस्ती भी बंद हो जाएगी , हम अपनी मस्तियों को लेकर बड़े संवेदनशील होते थे इसलये बच्चों की टोली ने पत्थर से दुरी रखी। इसी बिच दो दिन और बीत गए और अम्रिद भी अब पिला हो चला था। घर के बड़ों की नज़र में भी वो अलबेला अमरुद आ गया था।हम सब के द्वारा रोज़ नए नए तरीके सुझए जाते मगर कोई भी परवान नहीं चढ़ पता था कभी इतनी लंबी डंडी नहीं मिलती तो कभी पेड़ पर चढ़ने की हिम्मत भी नहीं होती।  यंहा एक बात अवस्य बता दूँ की हम्म से कोई भी पेड़ में चढ़ने में कुशल नहीं था अगर वो गुसलखाना नहीं होता तो हममें से कोई भी चढ़ नहीं पता शायद। 
इसके बावजूद पेड़ से हमें बहुत मोह था , मैं और मेरे हम उम्र दूसरे बच्चों के लिए भी ये एक अकेला अमरुद का पेड़ हमारे जीवन का पहला पेड़ होने का सुख रखता है। बरसात के मौसम में तो अमरुद खुद ही टूट टूट कर गिर जाते थे जिन्हें कभी चिडया तो कभी हम चुपके से उड़ा ले जाते थे। ओह हम कान्हा थे , अच्छा तो हुआ यूँ की उस रोज़ सुबह हम बच्चों के बिच महाभारत हो गयी। सबने एक दूसरे पर इलज़ाम लगाया कि उसने अमरूद चुपके से तोड़ लिया है , अच्छा खासा फसाद हो गया भला ऐसा होता भी क्यों न इतने बड़े पिले अमरूद को अकेले खाने की हिम्मत आखिर किसने की ये जानना बेहद ज़रूरी था। कुछ देर बाद घर के बड़ों के बिच हो हल्ला शुरू हो गया। हम डर गए सीढ़ी से निचे नहीं उतरे , कान लगा कर हमें से एक साडी बातें सुनने लगा ,  मेरी बड़ी बहन ने बताय की चाची के रसोई वाले करकट में सुराख़ हो गया है , हम सबने एक दूसरे का मुंह देखा अभी तो हम ये भी नहीं जान पाए थे की अमरुद किसने तोडा और अब ये पत्थर वाली घटना हो गयी। चोर हमारे बिच ही कोई है मगर कौन यही सवाल था।  उत्तर कर आँगन में आगये , बड़ों के झगड़े के रुख हमलोगों की ओर हो गया , सबने हमें ही इलज़ाम दिया  , अम्मान , चची , फूफी सब एक दूसरों को अपने अपने बच्चों को संभाल कर रखने की हिदायतें दे रही थीं।  हम बेचारे लाचार न तो अमरुद हाथ लगा किसी को , उल्टा हमें ही बेवक़्त पढ़ने की सजा मिल गयी , थोड़ी डाट पिलाई जाने के बाद किताब खोल कर बैठने को कह दिया गया।
उस रोज़ दिन भर बे वजह हम किताबों के साथ पड़े रहे , न कोई खेल और न कोई फैसला ही हम आपस में कर पाए। फिर सब कुछ शांत होने के बाद , रात के खाने के लिए जब मैं अम्मी के पास रसोई में गया , रोटियों की डोली उठाई तब एकाएक वही पिले बड़े अमरुद पर नज़र पड़ी जो बड़े सलीके से साफ़ी से छुपाई हुई थी। मैंने अमरुद देखा और अम्मी को देखा जो रोटियां बेल रही थीं। बिना कुछ कहे मैं चुप चाप रोटी लिए चला आया ये सोच कर की मेरी माँ को भी अमरुद बहुत पसंद है  , उनके गाँव में भी कई अमरूद के पेड़ थे , बचपन उनका भी अमरुद तोड़ते पेड़ो पर कुद-फान करते गुज़रा है।  हाँ , वो अलग बात है कि पेड़ों पर चढ़ने में महारथी मेरी माँ अब पेड़ पर चढ़ने की कल्पना भी नहीं कर सकती है मगर किया करें निशाना उनका आज भी अच्छा था बस वो हम बच्चों की तरह सोच नहीं पायी थीं की करकट भी टूट सकता है।     





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