जैसे ही नोटिस बोर्ड पर सब्सिडियरी सब्जेक्ट की लिस्ट देखी मेरे तो पैरों के निचे से ज़मीं निकल गयी , यूनिवर्सिटी में प्रवेश पाने के बाद यंहा के नए माहौल से ताल मेल बैठाने और पढाई में बेहतर करने का मेरा उद्देश्य भष्म होता दिखाई दिया क्योंकि 'हिंदी साहित्य का इतिहास ' मेरे सब्सि पेपर का विषय बन गया था और इस से पहले मैंने हिंदी को विषय के तौर पर पांच साल पहले आठवीं में पढ़ा था , तब भी मैं हिंदी भाषा में अतयन्त कमज़ोर छात्र था , न ही व्याकरण का ज्ञान था न ही वर्तनी का , चालीस , पैंतालीस से ज़्यादा अंक कभी ला नहीं पाया , बस इन्ही पृष्ठभूमि के साथ मैं नोटिस बोर्ड के सामने ही नि:शब्द खड़ा रहा।
सब्सि की पहली कक्षा में ही ये आभास हो गया था की मैं इस विषय में तो ज़रूर ही फ़ैल होने वाला हूँ क्योंकि पहली क्लास में गुरु देव के वाणी का कुछ भी रस मेरे भुद्धि में नहीं पंहुचा। एक , दो क्लास मैंने यूँही ही गुरुदेव से खुद को छिपाते हुए पूरा किया , कहते हैं न डूबते को तिनके का सहारा पर मुझे तो पूरी की पूरी नौका ही मिल गयी और ये" नौका" मुझे मिली गेस्ट फैकल्टी के तौर पर हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ाने आये डॉ.गणपत तेली से , प्रारम्भ में उन्हें टेबल के पास देखे कर सभी की तरह मुझे भी यकीन नहीं हुआ था की ये टीचर हैं , कद काठी में सामन्य , किसी नन्हे बालक जैसा मुख पर भोलापन , कपडे भी बेहद आम जन जैसे , कन्धों पर छात्रों जैसा बस्ता , बस फिर क्या था किसी भी छात्र को वो नए गुरुदेव प्रभावशाली नहीं लगे , हमारे कई साथियों से वो उम्र में छोटे दीखते थे हालाँकि ऐसा था नहीं।
पहली क्लास तो परिचय में चली गयी , फिर आई हिंदी साहित्ये की बारी , सर ने सबसे पूछा की पिछले क्लास तक आपने क्या सिखा है बताएं ? इसी में मुझे भी बोलने का मौका मिला अपनी हकलाती ज़बान से मैंने कुछ कुछ कह डाला , पता नहीं इस नए शिक्षक कोा जैसे हम सबके लिए वरदान बना के भेज गया था , ये हमें हिंदी साहित्य का इतिहास बेहद मनरोंजक रूप में पढ़ा रहे थे और साथ साथ हमारे मुख्य विषयों के बारे में भी चर्चा करते थे , पत्रकारिता में रूचि और वर्तमान पृदृश्ये को भी बताते चलते। क्योंकि मेरी तरह लगभग सभी तेरह छात्रों को ये विषय पढ़ने से परहेज़ था और हम भागना चाहते थे मगर फिर भी हमारी इस मंशा की जानकारी उन्हें थी इसके बावजूद गुरु जी कक्षा में हमसे पहले आते , हमारा इंतज़ार करते , पिछली क्लास में पढाई गयी बातों को फिर से दोहराते , हमारी शिकायत को भी सुनते और फिर अगली सुबह और नए तैयारी से पढ़ाने आते। इस पुरे घटनाओं के बिच मेरा गुरुदेव के साथ एक अनोखा सम्बन्ध स्थापित हो गया , मैं गुरुदेव के साथ कुछ कुछ बातें करने लगा , हम साथ में राजनीती और छात्रों के वर्तमान स्तिथि पर बातें करने लगे , चाय पर चर्चा भी हुई और हिंदी साहित्ये से डर दूर होता गया , उन्होंने सर्वप्रथम "डायरी" लिखने का निर्देश दिया , मेरा स्वाभाव जाने के बाद मुझे कहानियां पढ़ने को कहा , फिर प्रेमचंद के उपन्यासों के नाम बताए और हिंदी साहित्य में मनोरंजकता कायम रखने के लिए कभी कबीर के दोहे सुनाते तो कभी रहीम के , कभी कोई पुरानी कथा सुना दी तो कभी वर्तमान के कुछ लेखकों की कविता पढ़ दी।
समय गुज़रता गया और मुझे पता ही नहीं चला की हमने सिलेबस सिर्फ़ पढ़ा ही नहीं बल्कि इतनी अच्छी तरह से समझा है की अब वो मेरा डर नहीं आत्मविश्वाश बन चूका है , परीक्षा हुए और मुझे हिंदी साहित्ये में दूसरा सबसे अच्छा अंक मिला।
गणपत सर से हमारा कक्षीय-सम्बन्ध केवल एक साल का था फिर नए शिक्षकों ने हमें पढ़ाया , दूसरे और तीसरे सेमिस्टर में भी हिंदी सब्सि में मुझे दूसरे विषयों से अधिक अंक मिले और केवल अंक नहीं , साहित्य में जगी रूचि ने मुझे समाज के सवरूप और अवधारणा को समझने में सहयता की , फिर तो मैंने प्रेमचंद से लेकर रेनू , यशपाल , अज्ञेय , मंटो , इत्यादि रचनाकरों को समझने की कोशिश की । गणपत सर ने वास्तव में मेरी प्रारंभिक गलतियों को नजरंदजज किया और मुझे उत्साहित करते रहे तब ही आज मैं स्वंय को अभिव्यक्त करने के लिए हिंदी भाषा में दूसरी अन्य भाषाओँ से अधिक सहज महसूस करता हूँ।
आज जबकि दो साल गुज़र चुके हैं , सब्सि हिंदी का पेपर आखरी दफा लिखते हुए मेरे उद्देश्य पहले से अधिक स्पष्ठ और मज़बूत हो गए हैं और गणपत सर की वजह से अब परीक्षा ही एक मात्र वजह नहीं रह गयी है हिंदी साहित्य को पढ़ने का , गलतियां आज भी बहुत होती हैं मगर अब डर नहीं लगता की मेरे सपने पीछे रह जायेंगे या मैं कुछ कर नहीं पाउँगा , उस अकेली क्लास ने बहुत कुछ सिखाया है जिसकी फीस मैंने नहीं दी और न कभी दे पाउँगा। मुझे अब मुझ जैसे दूसरे बच्चों की तलाश है जिसे के ऊपर मैं ये क़र्ज़ दाल सकूँ।
आखिर में एक बात और गणपत सर के कहने पर ही मैंने ब्लॉग लिखना प्रारम्भ किया था और समय मिलते ही कुछ न कुछ लिख देता हूँ , आज फिर कुछ लिखा है मैंने अपने गुरु द्वारा पकराए हुए कलम से।
Comments
Post a Comment