अपनी अपनी परेशानी लिए लोगों की भीड़ रोज़ रोज़ आने लगी , लोगों को रोज़ की माथा-पच्ची से राहत मिल गयी , अब तो कोई भी एक छोटा सा मसला भी अगर फँस जाता तो लोग आपसी सहमति से सुलझाये बिना सीधा देवी के चरणों में आ गिरते , एक दूसरे का झूट पकरने की होड़ सी समाज में लग गयी थी।
फिर एक दिन कमला बाबू ने देवी के घर के पास पान की दुकान खोली , पान की दुकान के सामने आवसीय होटल खुल गया , चार पांच लौंडे लपाटे भी अपनी जेब भरने के खातिर भीड़ को मैनेज करने लगे , इसी में कोई किसी पक्ष से मोटी रकम ले कर देवी से पहले मिलवा देता तो जो एक रोकड़ा भी नहीं दे पाते उसकी बारी को ये अाने नहीं देते , भाड़ी संख्या में इस काम में नए नए चेहरे आ गए।
एक दिन एक शहर के सबसे बड़े सेठ जी का मामला भी देवी के दरबार में आया एक पुराने लौंडे ने सेटिंग की बहुत मोटी रकम वसूल किया और फैसला उनके हक़ में ही आएगा ये आश्वासन दिया परन्तु देवी इन सब किर्याओं से अनजान थी उसने सच और झूट को साफ़-साफ़ लोगों के सामने रख दिया , बस सेठी जी की शान पर बट्टा लग गया फिर क्या था उन्होंने सभी लौंडों को बुला कर डांट पिलाई , लौंडों ने देवी के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया , देवी पर सेठ जी को बदनाम करने का इलज़ाम लगाया , उसके घर को जला दिया गया , विद्रोही नारे लगाये गए , चरित्र -हीन होने का भी ठप्पा लगा , तभी भीड़ में से किसी ने कहा ''इस औरत पर यूँ आँख मुंड कर हम विश्वाश करते आये थे पर ये तो हमारा फ़ायदा उठा रही है " एक नौजवान ने कहा ये मर्दों को निचा दिखाना चाहती है। सेठ जे की बीवी ने कहा ये औरत नहीं डायन है। पान वाले ये सब देखते रहे और पान चबाते रहे उन्हें लगा कंही देवी मारी गयी तो उनकी दूकान भी बंद हो जाएगी , बस सभी साहूकारों ,सेठों , बनियों और लौंडों को लेकर एक मीटिंग की गयी , सभा में ये फैसला हुआ की ये औरत जो काम कर रही थी वैसे ही करती रहेगी बस इसके बदले फैसला हमारा कोई आदमी फैसला देगा जो इसके साथ बैठेगा , फैसला देते वक़्त इसके आँखों में पट्टी बांध दी जाएगी और हर शहर हर गाँव से लोगों को आने की ज़रूरत नहीं इस देवी का मंदिर सभी जगह निर्माण कर वाया जायेगा और देवी से मिलने से पहले लोगों को "भीड़ मैनेजर" के पास जाना होगा। .. . . .
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तब से लेकर आजतक ये देवी कुछ नहीं बोली और न देखी बस तराज़ू लिए अपने मंदिर में सच और झूट का सौदा बेचने को मजबूर रही।
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