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एक गीत सुना तो ऐसा लगा


मुझे याद है जब कैसेट और टेप रिकॉर्डर की धूम चल रही थी भारतीय घरों में तब मेरे पिताजी की अलमारी में ग़ज़लों , कव्वालियां और नज़्मों की बेहतरीन संग्रह हुआ करती थी , जिसे हम उस समय न चाहते हुए भी सुनने को मजबूर थे , ग़ज़लों और कवलियों से नौ वर्ष के लड़के को क्या मोह , तो बस जैसे ही टेप रिकॉर्डर के बजने की आवाज़ आती , मैं धीरे से अपना बल्ला और गेंद ले कर सहन में खेलने निकल जाता था।  क्योंकि पिताजी अक्सर ये ग़ज़लें और क़व्वाली सुनते वक़्त आराम करते , जिससे हमें खेलने का मौका मिल जाता था।  इस तरह से उस लाल-पिली रौशनी वाले टेप रिकॉर्डर का बहुत बड़ी किृपा रही है हमारे घर के सभी बच्चों पर। हमारी शोर और किसी के पुकारने की आवाज़ दोनों ही टेप की आवाज़ में गायब हो जाते थे।
उस दिन जब शायद रविवार था , और बरामदे  में हम बच्चों की टीम अपने बल्ले - गेंद और अन्य दूसरे खेलों में व्यस्त थी तभी ही अचानक एक आवाज़ ने हम सभी के खेलों को थोड़े देर के लिए रोक दिया , ये क्या  था ? ऐसी आवाज़ की तो हमने कल्पना भी नहीं की थी , इस वक़्त पिताजी अक्सर ग़ज़ल ही सुनते थे , ग़ुलाम अली , नुसरत  फ़तेह अली खान या तस्लीम आरिफ की आवाज़ में कोई नात , मगर ये नात नहीं था न ही कोई ग़ज़ल , मगर ये इतनी मधुर थी की मेरे सथियों ने खेल रोक दिया और इसी पर चर्चा करने लगे , जो उम्र में बड़े थे वो इसे गुन - गुना भी रहे थे, मुझे भी इस धुन ने सम्मोहित कर दिया था , बिना समय गंवाए मैंने भी गुनगुना दिया " एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे "
फिर उस दिन के बाद वो गीत कई बार हमारी टेप रिकॉर्डर से गूंजा , नातों और कवल्लियों की भीड़ में वो अकेला फ़िल्मी गीत भी था इसलिए ये सबकी ज़बान पर तुरंत चढ़ गया। घर के नौजवानों में इस गाने की अन्य से अधिक लोकप्रियता थी। इसी गाने ने हम बच्चों को भी टेप रिकॉर्डर के करीबियों में ला खड़ा किया , पिताजी के अनुपस्थिति में हम इस गाने का कैसेट लगा दिया करते थे , बच्चों का झुण्ड इधर उधर अपने पार्टी में लग जाते , उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था  कि ये कितना रॉक है हार्ड है या स्लो है , हमें तो अपनी मस्ती के लिए बस फ़िल्मी गीत होना अनिवार्य था। हालाँकि इस गाने के धुन इतने मधुर थे की  हममें से कोई भी ज़्यादा देर तक इसकी उपेक्षा नहीं कर पता और शांत हो क्र इसे गुनगुनाने लगता।
एक अलग तरह की ख़ुशी मुझे तब मिली जब टीवी पर रंगोली नामक कार्यक्रम में ये गाना आ रहा था , तब मैंने पहली दफा इस गाने को टीवी पर देख कर और भी अधिक मोहित हो गया था , गाने के बोल तो पुरे याद  तो थे ही , लगातार सुनने से गाने का भाव भी समझ में आने लगा था , उस दिन के बाद तो बिना भूले मैं वो गाना रोज़ सुनने लगा।  रंगोली के उस कार्यक्रम से ही मुझे ये पता चला जब गाने के साथ निचे लिखा आया था , फिल्म - 1942 ए लव स्टोरी , गायक - कुमार सानु , गीतकार - जावेद अख्तर और संगीतकार - आर दी बर्मन।
समय के साथ साथ हम बड़े होते गए और  टेप रिकॉर्डर से हमारा साथ छूटता चला गया , इसे दौर में मेरे साथ "एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे" श्रृंगार भाव वाला सुन्दर हादसा भी घटित हो गया मगर अफ़सोस तब टीवी पर कोई रंगोली नहीं देखता था और न ही कोई टेप रिकॉर्डर कंही बज रहा था जिससे ये गीत सुनाई पड़ती मगर उस गीत के धुन जिसे आर डी बर्मन ने तैयार किया था , निरन्तर मेरे अवचेतन में कंही न कंही बजा करते थे।
आज इतने सालों बाद जब संगीत और संगीतकारों का  एक रेला सा है तब ये बात बहुत सुखद आनंद देती है की तब आर डी बर्मन का पंचम दा बन्ने तक का सफर कितना रोमांचक रहा होगा , कैसे उनका नाम पंचम दा पड़ा इस बात को लेकर कई कहानियां हैं , मेरे मन ने जिस गाने को  सबसे पहले अपने अंदर उतरने दिया , उस गाने के धुन तैयार करने वाले संगीतकार को स्वंय ये कहने की ज़रूरत नहीं थी की वो 'पंचम दा' है जैसे आज के गायक उँगलियों से कहते हैं की वो यो-यो हैं या उन्हें गाने में बताना पड़ता है की वो बादशाह हैं। आर डी बर्मन के बेहतरीन संगीत ने उन्हें लोकप्रिय बनाया और 'पंचम दा' के लकब से नवाज़ा। उनकी 77 विं जन्मदिवस पर  पता नहीं क्यों ये मन कर रहा है की पिताजी को उन गीतों के कैसेट को बजाने के लिए धन्यवाद कह दूँ और पंचम दा को बहुत सारा स्नेह ।






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