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फर्क रंग और धूल का


                               फर्क रंग और धूल का 

हर राज्य हर शहर का अपना इतिहास है जो उसकी पहचान होती है। जिससे उसे चिन्हित किया जाता है।  इस चुनावी मौसम में तो हमारे नेताओं ने अपने प्रचार प्रसार के दौरान विभिन जगह की भाषा और वस्त्र का प्रयोग मंच पे किया ताकि वो अपना संबंध उस जगह से दिखा सके। 
पर कुछ बातें जो हमेशा परेशान करती हैं की छेत्रिय भाषा , पहनावा और संस्कृति में तबदीली की वजह आखिर है क्या ? अपनी पहचान से आखिर क्यों भागते हैं हम  , क्या हमारी सभ्यता और संस्कृति इतनी कमज़ोर है की  दूसरों की संस्कृति हम पर हावी होती जा रही है। हिंदी बोलना और पढ़ना तो मनो इज़्ज़त पर ठप्पे लगने जैसा है।  वही हाल पहनावे का भी है।  
बारहवीं उत्तीर्ण के बाद , मैं छोटे नगर की पगड़ी बांधे , कॉलेज में नामकन की जोत जगाये देश की धड़कन दिल्ली आ पहुंचा।  यंहा मौजूद मेरे जानने वालों में मेरी बुआ की बेटियां थीं, जो की दिल्ली से समीप गाज़ियाबाद के हाईवे पर एक हॉस्पिटल में डॉक्टर थी, मैं वंहा ठहरा। और खुद की नमकन की कोशिश में जुट गया।  माली हालत की वजह से नामकं न हो सका और एक वर्ष का इंतज़ार बढ़ गया। 
यंहा मेरी बुआ की छोटी बेटी जो मुझसे बड़ी है वो आईएएस बनने का सपना लिए एक पुरज़ोर कोशिस में लगी हुई थीं, मैं भी उनके साथ उनकी संस्थान में जाने लगा जो की हफ्ते में दो दिन होती। दिल वालों के शहर में बिताये दो दिन , पुरे हफ्ते की ग़ाज़ियाबाद की ख़ामोशी पर भरी परने लगी थी । नए रंग में रंगा ये मुग़लों का शहर मुझ पर एक दम सा हावी होने लगा। मेरे लहजे से कोई जान नहीं सकता था की मैं कँहा से हूँ।  अंग्रेजी हो या फिर वेश भूषा, मैं पूरा दिल्ली वालों जैसा हो चूका था।  
एक शाम मेरी बहन और उसके दोस्तों के साथ घूमते समय हमलोगों ने पिज़्ज़ा खाने का मन बनाया और फिर हम नज़दीक ही एक पिज़्ज़ा के स्टॉल पे जा पहुंचे।  बात चित के दौरान एक ने मुझसे कहा की 'तुम तो ज़रा भी बिहारी नहीं दिखते और हाँ बोल चाल से भी नहीं। छोटे नगर की काया पर ओढ़ी गयी आधुनिक रंग की प्रसंसा हो रही थी। मैंने अपनी इस तारीफ़ को अपनी विजय समझा। मैं खुस था की मैंने अपनी पहचान को बरी आसानी से छुपा चूका था। अंग्रेजी को अपनी भाषा में ऐसे मिलाया था जैसे मीडिया और वाणिज्य।  और मैं क्यों खुश न होता जो मैंने किया था उसीकी तो तारीफ़ हुई थी।  मेरी की हुई तबदीली ने रंग दिखाया था।  मैं अपनी ज़मीन से दूर हो चूका था तो उसकी गर्द भी उतार दी थी। कुछ खोने का एहसास नहीं था मुझे।  दोस्तों से दूर , घरवालों से दूर , मोहल्ला भी अपना नहीं था।  और ये तो अपने बड़ो से ही सीखा था मैंने, जो भी बहार जाता फिर कभी दो तीन महीने बाद लौट्ता तो उसके चाल ढाल में एक ओछा सा नया पन होता।  तो मैंने भी बस वही किया था सो मैं खुश था। 
एक सुबह अखबार पढ़ते वक़्त एक लेख पढ़ा जिसका मूल सन्देश था की ' किसी जीव का विनाश तब निश्चित हो जाता है की गर वो अपना वजूद खो दे।' मैं अपने विचारों की सीढ़ियों पर खड़ा इस सन्देश को समझ कर भी कुछ और तथ्य निकालने का प्रयत्न कर रहा था या यूँ कहे की अपने विजय की आलोचना मैं पढ़ नहीं पा रहा था  तभी मेरे फ़ोन की घंटी बजी, उठाते ही आवाज़ आई " हैल्लो , आप कौन ? , और मिस्ड कॉल क्यों किया ?" मैंने कहा मैं जिलानी मैंने ये नया नंबर लिया है तो कॉल किया पर तुमने उठाया नहीं। उधर से आवाज़ आई भाई आप ओह, मैंने कहा क्यों पहचान नहीं और ये कह कर हँसने लगा। मेरी बहन ने कहा की नहीं ऐसी बात नहीं है बस आवाज़ आपकी पहचान नहीं पायी एक दम दमदार हो गई  है आपकी आवाज़।" मेरी आवाज़ तो वैसे ही है जैसे हमेशा थी किस दमदार की बात कर रही हो तुम। उसने कहा " नहीं वो...... एक दम नया सा लगा रहा है "
मैं स्तब्ध हो गया की इस विनाश की बात तो नहीं हो रही है की मेरे अपने मुझे पहचान न सके।  मैं समझने की पूरी कोशिश कर रहा था की मैंने क्या किया है। अब बस मुझे लौटना होगा अपनी  पुरानी , उतरी कमीज की तरफ। वो रंग जो मुझ पर चढ़ा था वो धूल था असली रंग तो वो है जो मेरी ज़मीन का है जिसे मैंने गर्द समझा था। मेरी तारीफ करने वाले भी दिल्ली के नहीं थे , उनका संबंध भी एक गाँव से था। उन्होंने अपनी पहचान खो दी थी और मैंने छुपा दी थी। अब मैं बेचैन हूँ की कोई राह गुज़रे ये कह दे  " यार तुम तो पुरे बिहारी हो। "  

नाम: ग़ुलाम हुसैन 
       जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली)
      08194074059

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