26 जनवरी 1951 को भारत में लोकतान्त्रिक शक्ति का गठन हुआ था , 1992 में आर्थिक शक्ति का , और 2014 में विकास के अनुरूप बदलाव का गठन हुआ है।
पहले आम आदमी की शक्ति को चित कारते और राजधानी में राज्य - शक्ति का धरना देखा। फिर गठबंधन के पिछले तीस सालों के इतिहास को केंद्र में लोक द्वारा पलटते देखा। मानो न मानो , इन दोनों पटखनी में एक ही रूप रेखा वाली लहर थी जिसे किसी ने देखा किसी ने नहीं देखा। एक 'आम आदमी ' सुना रहा था तो दूसरा 'विकास ' लूटा रहा था। इन दोनों की पुकार को जनता का सहारा मिला , आम ख़ास बनता गया और ख़ास आम बन गया।
फिर तुरंत ही कुर्शी पर वज़न परा जब सदन लोगों से खचाखच भरा। होने लगे बदलाव धराधर , कंही बिजली के बिल घटे तो कंही हुए पुराने राज्य पाल बहार। सत्ता की इस धूम में ख़ास बने इस आम को फौरन ही एक वचन याद आया , लोकपाल बिल की हठ ने उसे कुर्सी से उतरवाया। ....कौन गिरा , कौन टुटा , कौन गया ठग , यही सोच में खोया हूँ मैं अब तक।
हाँ , सुसासन की जब बात चली तो प्रधानमंत्री ने उड़ान भरी। देश - विदेश में किया गुण गान , कर वाई भारत की नई पहचान। विकास का नया पाठ पढ़ाया , ' भारत में ही बाजार ' मंगवाया ।
सभी मंत्रालय ने कमान संभाला , नई योजनाओं का खुल रहा था पिटारा ,
बस विदेश मंत्रालय में लगा था ताला , पी.एम ही कर रहे थे सब निपटारा
पर सदन में अफ़सोस था वही नज़ारा , मुद्दा चाहे जो भी हो मंत्रियों ने खूब खेला अखाड़ा।
वही पुरानी छलकपट वही पुरानी बात , बेतुके विषयों के चलते ठप रहा कामकाज। एक मंत्री जी थे बड़े ही प्यारे , ज्योतिषी विद्या को बताया विज्ञानं से आगे। एच.आर.डी ने भी कमाल दिखाया , संस्कृत का बिगुल बजाय।
साध्वी और आरएसएस को कांग्रेस का धन्यवाद , विपझ बनने का जो दिया सौगात।
स्वच्छ भारत का जब चला अभियान , तो फिर धर्म परिवर्तन का क्या था काम।
विदेश से है हमें वापस लाने , काला धन और pm हमारे ।
दो बातों पर खूब मिली बधाई , मंगल अभियान और नोबेल जब आई।
इस तरह हुआ साल का अंत , अटल और मालवीया को मिला 'भारत रत्न' .
पहले आम आदमी की शक्ति को चित कारते और राजधानी में राज्य - शक्ति का धरना देखा। फिर गठबंधन के पिछले तीस सालों के इतिहास को केंद्र में लोक द्वारा पलटते देखा। मानो न मानो , इन दोनों पटखनी में एक ही रूप रेखा वाली लहर थी जिसे किसी ने देखा किसी ने नहीं देखा। एक 'आम आदमी ' सुना रहा था तो दूसरा 'विकास ' लूटा रहा था। इन दोनों की पुकार को जनता का सहारा मिला , आम ख़ास बनता गया और ख़ास आम बन गया।
फिर तुरंत ही कुर्शी पर वज़न परा जब सदन लोगों से खचाखच भरा। होने लगे बदलाव धराधर , कंही बिजली के बिल घटे तो कंही हुए पुराने राज्य पाल बहार। सत्ता की इस धूम में ख़ास बने इस आम को फौरन ही एक वचन याद आया , लोकपाल बिल की हठ ने उसे कुर्सी से उतरवाया। ....कौन गिरा , कौन टुटा , कौन गया ठग , यही सोच में खोया हूँ मैं अब तक।
हाँ , सुसासन की जब बात चली तो प्रधानमंत्री ने उड़ान भरी। देश - विदेश में किया गुण गान , कर वाई भारत की नई पहचान। विकास का नया पाठ पढ़ाया , ' भारत में ही बाजार ' मंगवाया ।
सभी मंत्रालय ने कमान संभाला , नई योजनाओं का खुल रहा था पिटारा ,
बस विदेश मंत्रालय में लगा था ताला , पी.एम ही कर रहे थे सब निपटारा
पर सदन में अफ़सोस था वही नज़ारा , मुद्दा चाहे जो भी हो मंत्रियों ने खूब खेला अखाड़ा।
वही पुरानी छलकपट वही पुरानी बात , बेतुके विषयों के चलते ठप रहा कामकाज। एक मंत्री जी थे बड़े ही प्यारे , ज्योतिषी विद्या को बताया विज्ञानं से आगे। एच.आर.डी ने भी कमाल दिखाया , संस्कृत का बिगुल बजाय।
साध्वी और आरएसएस को कांग्रेस का धन्यवाद , विपझ बनने का जो दिया सौगात।
स्वच्छ भारत का जब चला अभियान , तो फिर धर्म परिवर्तन का क्या था काम।
विदेश से है हमें वापस लाने , काला धन और pm हमारे ।
दो बातों पर खूब मिली बधाई , मंगल अभियान और नोबेल जब आई।
इस तरह हुआ साल का अंत , अटल और मालवीया को मिला 'भारत रत्न' .
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